Hindi Short Story With Moral Values [2020]

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Hindi Short Story With Moral Values [2020]  4 Hindi Stories

Hindi Short Story With Moral Values

[1]कमला दीदी
 'प्राची जाधी की तरह आती, तूफान की तरह चली जाती। सुबह से शाम तक इस पर से उस घर दौड़ती ही रहती। पर सुकून नहीं, शिकायतों के घेरे में कैद ही रहती। सबको खुश रखने की कोशिश करती। फिर भी कोई न कोई नाराज हो ही जाता। वह सबकी सुनती पर उसकी सुनने वाला कोई नहीं होता। कई बार उसके मन में आया इस तरह के झंझट से पिंड छुड़ा ही ले, पर दिनचर्या कैसे चले, बच्चे कैसे पलें? यह सोचकर मन मसोसकर रह जाती। कोई कुछ बोलता, चुपचाप सुनती रहती, बिना ध्यान दिये अपने काम में जुट जाती। बच्चों से बूढ़े तक उसे कमला दीदी के नाम से पुकारते। इस पुकार में जो मिठास होती, दिनभर की थकान दूर कर देती। उसके बिना किसी को चैन नहीं। एक दिन भी यदि किसी कारणवश नजर नहीं आई, उसकी तलाश अपनों से ज्यादा किसी-किसी को होने लगती। मोहल्ले की रसिका ताई को तो कमला से कुछ ज्यादा ही लगाव हो गया था। घर-घर की कहानी सुनने एवं सुनाने की पुरानी आदत जो ताई की थी। हर रोज मुहल्ले की घटना। कमला से सुनने को उसे मिल ही जाती। कमला को भी आस-पास की कुछ खबरें रसिका ताई से सुनने को मिल जाती। कई घरों में काम करने को जो जाती। झाडू-पोंछा, बर्तन साफ करते समय घर की सारी कहानी बातों-बातों में जान लेती। किस घर में क्या बनता है? सास बहू का कैसा रिश्ता है? पति-पत्नी संबंध से लेकर घर-गृहस्थी के हालात तक की खबर कमला को होती। जिसे बड़े चाव से रसिका ताई कमला से सुना करती और दूरभाष से भा ज्यादा उसे क्षेत्र में प्रचार-प्रसार कर देती। लोग समझ नहीं पाते कि रसिका


का इतनी खबर कहां से मिल जाती। पर कमला को काम करते वक्त जब श्वर-उधर की बातें करते सनते. तो यह भी रहस्य ज्यादा दिन नहीं रह पाया। मा काकी तो अपनी बहू को कमला के सामने आने से रोकने भी लगी।
कमला जब दूसरे घर की बात आकर मुनायो है बह। तो वह इस घर की भी बात दूसरे घर सुनाती होगी....श्यामा काकी अपनी बहू को समझाते हुए कमला से दूर रखने का प्रयास तो करती पर कमला कभी-कभी श्यामा काकी की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर पूरे हफ्ते की खुराक हासिल कर ही लेती। श्यामा काकी को दूसरे घर क्या हो रहा है, यह जानने की मन में इच्छा तो अवश्य होती पर उसके घर की खबर दूसरे पर जाय, कभी नहीं चाहती। इस कारण वह कमला को कई बार इधर-उधर की खबर पर टोक चुकी थी पर कमला जो आदत से लाचार थी, बिना खबर दिये, उसे चैन कहाँ। उसकी इस आदत पर कई घरों से काम पर नहीं आने के संकेत मिलते पर कुछ दिनों में सब कुछ टांय-टांय फिश हो जाता। काम करने की आदता जो लोगों की छूट गई। कमला दीदी के बिना किसी का नहीं चलता। श्यामा काकी ने भी कई बार कमला से काम नहीं कराने को सोचा पर काम कौन करे? यह भी एक समस्या थी। लोग क्या कहेंगे? घर में नयी बहू के आते ही श्यामा काकी ने झाड़-पोंछा, वर्तन साफ करने वाली को हटा दिया। इस इज्जत के मारे वह चाह कर भी उसे हटा नहीं पाती। दुसरे काम करने वाली का क्या भरोसा? कमला कम से कम ईमानदार तो है। झाड-पोंछे के वक्त कमला को एक बार अहू के कान के झूमके की सोने की रिंग मिली जिसे कमला ने श्यामा काकी को लौटाकर जो ईमानदारी की मिसाल कायम की, उसे वह आज तक नहीं भुला पाई। जब कि झाड्-पोंछा करने वालियों के उस दास्तान से भी वह परिचित थी जो बर्तन साफ करते-करते घर का माल तक साफ कर देती। इस मामले में कमला बेदाग थी। इसी कारण झाड़-पोंछा के लिये घर में कभी-कभी देर से आने के कारण कमला को हटाने की वह रामू के पापा की बात नहीं। मान सकी। कमला का पक्ष लेते हुए रामू के पापा को समझाते हुए कहकर बात टाल देती कि आज के समय में कमला जेसी बाई का मिलना नामुमकिन है।
ईमानदारी के कारण ही उसे कई घरों में काम भी मिला था। आज तक किसी ने उसे दुश्चरित्र के लिये काम से हटाया हो ऐसी खबर कहीं से नहीं यी। घर में कोई बच्चा भी रहे, वह अपना काम करती और चली जाती। बस उसकी एक ही कमी थी, किसी बात को वह पचा नहीं पाती। समय-समय पर घर की मालिकिन को नेक सलाह भी दे दिया करती। उसकी इस आदत से कई परेशान भी रहते पर ही कारनामे गौण थे। उसके बच्चों ने की

पान भी रहते पर इमानदारी की वजह से उसके इस तरह

ण थे। उसके बच्चों ने कई बार इस तरह के काम करने से रोकने पास किया पर रोक नहीं पाये। अपने काम एवं व्यवहार के बल वह सारे

ले की कमला से कमला दादी बन चुकी थी। दिनभर इस घर से उसपर दौड़ती मिलती। कहा दर होने से घर की मालिकिन की फटकार मानने को मिलती तो कहीं उसकी खबरी दिनचर्या की प्रतीक्षा होती। इस तरह की जिंदगी के बीच गुजारते उसने अपने जीवन के अनमोल क्षण लोगों की सेवा में ही बिता दिये। आज उसके बिना सब कुछ अधूरा है। नहीं चाहते हुए भी कमला दीदी की प्रासंगिकता उसे जीवित रख सकी है। लोग न तो कमला को छोड़ना चाहते, न कमला अपने काम को। हर दिवाली पर उसे उपहार पाने की मन में लालसा रहती। किसी घर से उसे नये बर्तन मिल जाते तो कहीं से


बच्चों के लिये सुट-पटाके, साड़ी तो प्रायः हर घर से मिल ही जाती। जिससे उसके अपने साल भर का लेन-देन का भी कार्य निपट जाता। जब भी वह काम बीच में छोड़ने की धमकी देती तो लोग इस बात को आसानी से ताड़ लेते कि दिवाली तक तो वह काम छोड़ नहीं सकती, आगे वे देख लेंगे। पर कितनी दिवाली गुजर गई. दिन पर दिन वह उम्र की सीमा भी पार करती गई। दिवाली की रोशनी में मिले उपहार उसे बीती बातें भूला देते और वह नये उत्साह के साथ फिर से काम में जुट जाती।




Hindi Short Stories with Moral Value 

Hindi Short Story With Moral

[2]पेंशन में टेंशन
अंजनीकुमार शर्मा ग्रामीण डाकघर में काम का इतना बोझ बढ़ गया है कि पूछिये मत. लपटोलिया के पोस्टमास्टर विजय बाबू को न खाने की फुर्सत मिलती है। नहाने की। लेकिन गलथोथरी और किचकिच करने से उनका माथा जरूर भरिया जाता है।

पोस्ट ऑफिस के कोने-कोने में कागजों का ढेर लगा रहता है। किया चूहा कुतर रहा है, किधर दीमक चाट रहा है, उसे देखने की विजय बाबू को फुर्सत कहाँ? उनका तो मूरा समय मेंशन भुगतान और हिसाब-किताब में ही बौन जाता है।

विजय बाबू के कुर्सी पर बैठते ही पेंशनधारियों का मजमा लग जाता है। वृद्धा पेंशन, विधवा पेंशन, विकलांग पेंशन फिर नरेगा और मनरेगा के तहत काम करने वाले मजदूरों के भुगतान की जवाबदेही विजय बाबू के कंधों पर ही है न। बूढ़ा और बूढ़ी से पोस्ट ऑफिस भरा रहता है। न तो बेंच पर जगह, न चौकी पर, न तो जमीन पर जगह खाली रहती है। खड़े रहने पर भी आफत। सबका तो एक ही लक्ष्य है पैसा।

अब विजय बाबू क्या करेंगे? सबको एक नजर से देखना पड़ता है। शिकायत हो गई तो और आफत! वार्ड कमिश्नर, ग्राम-सेवक से लेकर बी.डी.ओ. तक का काम सिर्फ पेंशन पास करना है। भुगतान की सारी जिम्मेदारी पोस्ट ऑफिस की हो जाती है।

पेंशन में टेंशन सबके साथ है सिर्फ विजय बाबू के साथ ही नहीं। ग्राम सेवक और वार्ड कमिश्नर के दबाव के कारण कभी-कभी गलत काम में करना पड़ता है। कम उम्र वाले को भी पेंशन के लिए अग्रसारित करना पड़ा। है। बी.डी.ओ. साहब को डर है कि जितना पास किये हैं कहीं गलत निकल गया तो लफड़ा ही लफड़ा है। सरकार को चिन्ता है पेंशनधारियों के लिए पैसे
आजोगाड़ करने की।
बाट मेडियाधसानी कारोबार हो गया है पोस्ट ऑफिस का। किसके हाथ में हथकड़ी लगेगी कहना मुश्किल है।
पोस्ट ऑफिस में पैसा रहे या न रहे मजमा तो रोज लगना ही है। यानि का जाय कि लपटोलिया का पोस्ट ऑफिस एक तरह का 'मजमा सेन्टर' हो गया है। गांव-घर का किस्सा सुनाने के लिए इतनी उपयुक्त जगह औरतों को कहाँ नसीब होगी?
जो कभी बेचारी रिक्शे पर नहीं चढ़ी थी, पेंशन ने रिक्शे का मुंह दिखा दिया। पैसा का टेर लेने के लिए रिक्शे से ही आना-जाना करना पड़ता है। दलती उम्रने उनको लाचार भी तो बना दिया है। सिर्फ लाठी के सहारे इस ढलती उम्र में मीलों का सफर तय करना मुश्किल है।
किसी-किसी बूढी का तो पेंशन रिक्शा में ही चला जाता है। चला जाता है तो क्या, पोस्ट ऑफिस का हवा पानी भी लेना जरूरी है न....? दिक्कत क्या है, अगले महीने फिर पेंशन मिलेगी? कोई काम करके पेंशन लेना है क्या?
बहुत गिड़गिड़ाने के बाद भी बीड़ी और हुक्का के लिए बेटे से मांगने पर नहीं मिलता था। अब बेटा ही आगे पीछे किया करता है। सरकार ने पेंशन की पोटली खोलकर मुर्दे को जिन्दा कर दिया है। यह क्या कम है?
विजय बाबू के पास पहले तीन आदमी थे अब दो स्टॉफ बचे हैं। काम ज्यादा और आदमी आधा। अकेले विजय बाबू को सारा काम जवाबदेही के साथ निबटाना पड़ता है।
रोज का रोज लेबलिटी भरकर भेजी जाती है विजय बाबू द्वारा। उस हिसाब से पैसा आता कहां है? पेंशनधारी कितना समझेंगे भितरिया बात। पैसा के लिए हंगामा करते रहते हैं। कहां से पैसा आता है और कौन देता है इससे किसी को कोई मतलब तो है नहीं।
जब से विजय बाब को पता चला है कि अब शिक्षकों का भी पेंशन भुगतान पोस्ट ऑफिस के माध्यम से मिलेगा तो उनका माथा और भी भारी हो गया है। थोड़ा-थोड़ा दर्द सीने में होने लगा है।
मन ही मन वे बुदबुदाने लगते हैं
होगा अब और बंटाधार। मर्च को समझाना तो आसान है पर पढ़े-लिखे का कान समझायेगा? हार्ट का मरीज बनना अब तय हो गया विजय बाबू का।
आज विजय बाबू कुछ ईजी मूड में लग रहे थे। सोच रहे थे कि पैसे अभाव में भीड़-भाड़ कम होगी लेकिन यह क्या?
पक्का दस बजे गले में गमछा लटकाते हुए टिपुआ आ जाता है और मंछ पर हाथ फेरते हुए विजय बाबू से कहता है
'आय रोसरो दिन ठिकै पोस्टमास्टर साहब जे अपने लींगा ऐलो छियै। टिपुआ ऐसनो आदमी के पैसा लेली मसक्कत करे पड़े है, ठीक बात नै छ। एना के टरकैभी 7 वेरगरे देखी लेभौ?'
'बड़िये बात है न जो यहां आकर आप दर्शन दिये, विजय बाबू ने कहा-'आपको टरकाने का लोगों में हिम्मत चाहिए।'
की बढ़िया बात है, टिपुआ ने कहा- हाथों में पैसा ऐवै तवे नी बढ़िया बात। तोरो बोली में लगै छै खाली जहरे मिलतो रहे।' __ 'आयगा पैसा, लेकिन कहना मुश्किल है कब आयगा?' विजय बाबू ने।
'देखो मास्टर बाबू! आय जो पैसा न मिलथौँ त सच कहें छिहौंन तोरो नरेटी दावी देभी', टिपुआ ने धमकाते हुए कहा-'केश मुकदमा होतै त बोकरो गम फिकिर नै छै। कोनी केश मुकदमा अभियो कचहरी में लटकलो छै। के त टिपुआ के कोय अंतर नै पडै छ।'
'नरेटी दाबने से क्या पैसा मिल जायेगा?' तवे ठांय-सांय करला सें?'
इस तरह की बेतुकी बातें सुनकर वहीं बैठी भकुनीदेवी से नहीं रहा गया, उसने टिपुआ से कहा
'अरे टिपुआ एना कहिनें बोले हैं रें। हमरा आगू में जन्मल् आरो तोरो साठ अरस कहिया पूरी गेलो रे? चोरी आरो सीना जोरी? पोस्टमास्टर साहब चाहनौ त तोरा जेल भेजवाय देती।' _'अगे बुढ़िया! देर खैरखाही अच्छा नै लगै छै', टिपुआ ने कहा-'तोही सिनी खुस दे देके पोस्टमास्टर साहब के विगाड़ी देने हैं।'
'जो रे छौंड़ा, कते बोले छै', भकुनीदेवी ने कहा-'लूर जूत रहथियौ त एन्हें बड़ो से ओलथिहैं। पोस्टमास्टर साहब की घरों से पैसा देती।'
'तवे की तोच अपना घरों से पैसे देमै को?'
'एना हरमुट्ठी बोलो बोलला से आरो काम बिगड़ी जैतौ।'
कहलियौ नी बुढ़िया मुहों के सीबी के राख', टिपुआ ने कहा-'ने त सब श्रीध पराय देयौ। जाय के सांय आरो बेटा सें शिकायत करिहें। देखौनी की करी लैती? बेटवां सब पैसा पेंशन के छिनये लै छौ, कहिहैं वोकरा से पिस्टल खरीदी लेती। हम्मू उन्ने से श्री नट ले के ऐवौ, अबकी बेर अच्छे से फरियाय लेगी। अभिया कहै छिहौ की चुप रहें बुढ़िया।'
बहस देखकर बगल में बैठी सितया माय को नहीं रहा गया, भकुनीदेवी का बचाव करते हुए बोली
'अरे टिपुआ तोंय की हिरो बनी गेलो है? भकुनी से ऐना कहिने बोली रहलो छै? अभी तोरो उमर पचासो नै पुरलो छौ आरो बहस करी रहलो छ। केना केना धमकाय के सठवर्षा पेंशन ले लेल्हें सबके पता है। टोला में लंपटगिरी के सिवा तोरो की काम छौ? अभी बौस मौगी यहां बैठलो छ, एक एक धप्पर जो लगी जैतौ त जान बचाना मुश्किल में जैतौ।
'अहो! तोय छिकै सितया माय, मौगी के सरदार', टिपुआ ने कहा-'तोय हमरा थप्पर मार}। तोरों से सलटी लेबी कही दै छियो।'
बहस के दौरान ही पोस्ट ऑफिस के आगे मुखिया सुधीर की मोटरसाइकिल लग जाती है। यह दनदनाकर पोस्टमास्टर साहब के पास पहुंचता है। नमस्ते कहकर कुर्सी खींचकर बैठ जाता है।

टिपुआ पर नजर पड़ते ही बोला-'की हाल छौ रे टिपुआ।' 'ठीक्के छ।' 'पैसा लेमैं की।'
हौं त कधी ले ऐवै यहां?' 'मिललौ?' 'पोस्टमास्टर साहब होशियारी बतियाय रहलो छ।' होशियारी!' 'पुछी के देखौ, आपने पता चली जैथौं।'
'क्यों नहीं पैसा देते हैं पोस्टमास्टर साहब', मुखिया ने विजय बाबू की ओर सर घुमाते हुए कहा-'टिपुआ का पैसा पास हो गया है विजय बाबू। इसको पैसा देने में अब कोय परेशानी नहीं है।'
'जानते हैं पर पोस्ट ऑफिस में पैसा रहेगा तब न।' विजय बाबू ने कहा। 'पैसा क्या टिपुआ लायगा कि आपको जोगाड़ करना है?' सुधीर मुखिया ने कहा
लालान डाकघर से पैसा खुद भेजा जायेगा।' विजय यादी कहा-रोज का रोज लेबलिटी जो भेजा जाता है। कितना बकाया है माय को सब पता है? वहां बैठे लोग बहुत चतुर, चालाक और सयाना है।
ही नहीं विजय बाबू! ई बोलने से काम नहीं चलेगा-मुखिया । कहा-'कल तो गरीब और असहाय के लिए आपको पहल करनी ही पड़ेगी।
तब आप क्या चाहते हैं, पैसा लाने पोस्टमास्टर खुद जायगा', विजय शाय ने कहा-'अपना पैसा खर्च कर जायेंगे और आने में कोई पैसा छीन लेत तो कल देगा? जान भी जा सकती है ऐसे में। नौकरी करने आये हैं कि जान गंवाने। आप उस समय पीठ दिखाकर नौ दो ग्यारह हो जाइयेगा।'
दस टका बसूलते क्यों नहीं जुड़वा-बुढ़िया से?' ‘गवाह दिलवाने का तो र पैसा देती है और आप कहते हैं.....' हम तो डेली आते हैं पोस्ट ऑफिस तेल खर्चा करके, हमीं दे देंगे

गणाही', सुधीर मुखिया ने कहा-'लेकिन इन लोगों का पैसा ऐसे में सब रिक्शे में हो चला जायगा तो खायगा क्या सुथनी....?
'खा ही रहा है न मेरा माथा...।' पोस्टमास्टर ने कहा।
'आपका क्या खायगा माथा पोस्टमास्टर साहब', मुखिया ने कहा-'खाता। है तो मेरा माथा ये लोग भर दिन। सरकार भी नौटंकी करती है। खाली बोट की राजनीति करती है। पेट्रोल और डीजल का दाम बढ़ा देती है और सब दिया हुआ पैसा वसूल लेती है। पैसा लेने के लिए चक्कर लगाते रहिये रोज। यही सब न संद फंद करके सरकार भी पैसा जुटाती है। कोनो घर से पैसा वह देती है?ई कोठी का घानक कोठी में।'
'मुखिया जी! राजनीति का गप यहां नहीं ही कीजिये तो अच्छा।'
सबका पेट जल रहा है और आपको राजनीति का गप लग रहा है, मुखिमा जी ने कहा- पेंशनधारियों की चिन्ता छोड़कर आप सरकार के पक्षधर हो गये हैं क्या?
क्षयर! हम तो सूचना देकर पैसा बांटते हैं, विजय बाब ने कहा-'लेकिन ये लोग मानते ही नहीं है। नौद टूटते ही मोरे-भोर पोस्ट ऑफिस की ओर दरवन लगाने लगते हैं। ठीक से मैं ब्रश भी नहीं कर पाता है। मेरी इसमें क्या गलती है वताइये?
'चलो न मुखिया जी सुलतानगंज में ही सबके रपेटियै त चारो दिशा सदसे लगते', बीच में हस्तक्षेप करते हुए टिमुभा ने कहा-'टेबुल-कुर्सी फेके लगवे त समझ में ऐहै।
'तुम क्या अपना घर समझते हो टिपुआ ' मुखिया ने उसे समझाते हुए कहा-'सरकारी विभाग है, जेल की हवा साने लगोगे। शिकायत करने से भी कोई फायदा नहीं है कहीं। पोस्टमास्टर साहब ठीक कहते हैं। आराम से घर में बैठो। पैसा तुम्हारा है कोई खा नहीं जायेगा? सरकार के घर में देर है लेकिन अंधेर नहीं है।
मखिया की बातों पर सबने यकीन कर विजय बाबू पोस्टमास्टर को जोरदार सलामी ठोककर सभी वहां से प्रस्थान कर गये।
सबके जाने के बाद मुखिया जी ने विजय बाबू के कान में कुछ बुदबुदाया-'मेरा भी मनरेगा में लेबर का पैसा बकाया है विजय बाबू। भुगतान में काफी विलम्ब हो गया है। गाली-गलौज सब करता है घर पर जाकर। कैसे काम होगा? घर का भी पैसा खर्च हो गया है।'
'तब तो आपका हेवी एमाउन्ट होगा?'

ही है तो करीब पचास हजार।' 'तय तो सुलतानगंज डाकपर से ही पास करवाकर पैसा भेजवाना होगा।'
'असल में विजय बाबू क्या कहें आपसे', सुधीर मुखिया ने कहा-'मैं वहां जाना नहीं चाहता हूं।'
'क्यों?
'दान-दक्षिणा में सौ दो सौ रुपये देखते-देखते लग जाता है, मुखिया ने कहा-'चाय-पान कराना पड़ता है सो अलग।'
'युग के अनुसार तो चलना ही पड़ता है न मुखिया जी', विजय बाबू ने कहा-'हर जगह तो एक ही सिस्टम है।'
'तो ठीक है पोस्टमास्टर साहब, अब चलते हैं', सुधीर मुखिया ने कहा-'सही में 'पेंशन में टेंशन' हर जगह है।'

Moral Stories in Hindi

Hindi Short Story

[3]समर्पण
डॉ. मिथलेशकुमारी मिश्र
सांस्कृतिक कार्यक्रम आरंभ होने का समय हो चुका था मगर गीता अब तक नहीं आई थी। कार्यक्रम का संचालन उसी को करना है। यह सोच-सोचकर संस्था के निदेशक अक्षय बाबू बेहद परेशान थे। दर्शक रह-रहकर शोर करने लगते। सक्षम बाबू को समझ में नहीं आ रहा था कि वह क्या करें? तनाव के कारण उसके सिर में दर्द होने लगा तो उन्होंने अपने सहायक को व्यवस्था का भार सौंपा, स्वयं द्वार पर खड़े होकर गीता की प्रतीक्षा करने लगे। अभी वह गीता के विषय में सोच ही रहे थे कि वह एक कार में आयी और बिना अक्षय को कुछ बोले मंच की ओर बढ़ गयी। अक्षय दु:खी हो गये....हम तो प्रतीक्षा करते-करते मर गये और उसके मुंह हाय...हैलो' कुछ भी नहीं....उनका मन हुआ कि कार्यक्रम को छोड़-छाड़कर घर लौट जाएं और दीवारों से सर टकरा-टकराकर जान दे दें....मगर.दर्शक...प्रतिष्ठा...फिर ध्यान आया गीता का...वह क्या सोचेगी?
यह ध्यान आते ही वह भारी कदमों से मंच पर चले गए और गीता ने संचालन का भार संभाला और कार्यक्रम अपनी गति से चलने लगा। संचालन कक्रम में गीता का स्वर एवं चाल देखकर उन्हें धक्का -सा लगा....अरे! लगता है इसकी तबीयत ठीक नहीं है....वह अपने को कोसने लगे....अपने धैर्य को धिक्कारने लगे....उन्हें दुख हुआ कि गीता ने यदि 'हाय...हैलो' नहीं की तो स्वयं उन्हें ही बढ़कर उसका हाल-चाल पूछना चाहिए था....समर्पण में एहसान, स्वाभिमान, क्षमा याचना, स्पष्टीकरण जैसे शब्दों के लिए कोई स्थान नहीं होता....वहां तो मात्र समर्पण होता है...उन्हें अपने आप में ग्लानि होने लगी....उन्होंने अपना कार्य अपने सहायक को सौंप दिया और स्वयं कार्यालय में आकर बैठ गए...और पश्चाताप की आग में जलने लगे।
गीता ने देखा कि अक्षय कहीं दिखायी नहीं दे रहे हैं तो, वह संचालन
तो करती रही..मगर जैसे-तैसे....कार्यक्रम जैसे ही समाप्त हुआ, गीता ने सहायक निदेशक से पूछा-'अक्षय साहेब कहां हैं?'
'जी! वह अपने कार्यालय में हैं....उनकी तबीयत जरा....।'
पूरी बात सुने बिना वह लपककर कार्यालय की ओर बढ़ गयी....'अक्षय क्या हुआ?'
'कुछ नहीं....ठीक हूं। तुम बताओ तुम्हारी तबीयत कैसी है?' 'अरे! मुझे क्या हुआ है....मैं तो बिल्कुल ठीक हूं।'
'तो फिर तुम्हें देर कैसे हो गयी? गीता अपने अक्षय से झूठ मत बोला करो....तुम्हारी आंखें तुम्हारी चुगली कर देती हैं....'
'तुम यों ही परेशान मत हुआ करो....मैंने तुम्हें मंच पर नहीं देखा तो परेशान हो गयी....मैं ही जानती हूं कि मैंने कैसे कार्यक्रम को जैसे-तैसे निबटाया है और गीता उसके सीने से लग गयी...-'अक्षय! तुम अपना ध्यान रखा करो.मेरी चिन्ता मत किया करो।'

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Hindi Short Story with moral 2020

[4]ईश्वर से बड़े पंच
डॉ. संतोष गौड़ 'राष्ट्रप्रेमी'
कैलाश पर्वत के पवित्र सुरम्य व मनमोहक वातावरण में बसंत ऋतु के आगमन ने चार चांद लगा दिये। देवाधिदेव महादेव समाधि में विराजमान थे। पार्वती अकेले बैठे-बैठे बोर हो रही थी। वे बार-बार विचार करती, ऐसे मनोरम वातावरण में भी महादेव को क्या सूझी कि समाधि में बैठ गए। उसी समय 'नारायण, नारायण' की ध्वनि सुनाई दी। भ्रमण करते हुए त्रिलोकी पत्रकार नारद आ पहुंचे। नारद तो ठहरे पत्रकार उन्हें तो सभी लोकों की खबरें चाहिए ताकि सभी को सूचना देकर मीडिया की ताकत से रूबरू कराते रहे। पार्वती ने उनसे कुशल समाचार पूछे। देवलोक, ब्रह्मलोक व विष्णुलोक के समाचार जानकर अपनी प्रिय सहेली लक्ष्मी व सरस्वती के हाल-चाल सुने।
नारद इस दौरान पार्वती द्वारा परोसे गए नाश्ते के बाद लस्सी पी कर निवृत्त हो चुके थे। हाथ साफ कर जब वे सीधे होकर बैठे तो पार्वती ने नारद से प्रश्न किया। नारद जी आपने शादी-विवाह तो किया नहीं, आपका समय कैसे कटता होगा? मैं तो महादेव जी के समाधि पर बैठने वाले दिनों में ही इतनी बोर हो जाती हूँ कि यहां से कहीं घूमने जाने का मन करता है; किन्तु महादेव जी को समाधि में छोड़कर कहीं जा भी नहीं सकती। एक तो उनकी देखभाल करना आवश्यक है; दूसरे गुस्सैल बहुत हैं पता नहीं, मैं कहीं चली जाऊं और वे नाराज हो जायें। एक बार पहले गलती कर चुकी हूं. दुबारा नहीं कर सकती। एक बार की गलती के कारण तो मुझे जलते हुए हवन कुण्ड में कूदकर दूसरा जन्म लेना पड़ा और घोर तपस्या करके महादेव को दुबारा पाया है। अब में कोई गलती नहीं करना चाहती। वास्तविक बात यह भी है कि महादेव से अलग रहने की मैं कल्पना भी नहीं कर सकती। अतः यही बैठे-बैठे बोर होती रहती हूं।
नारद बोले-'आप सही कहती हैं। देवलोक में विष्णुलोक हो या
ब्रह्मलोक, अमरावती हो या यमपुरी या देवाधिदेव शिवजी का कैलाश सभी स्थानों पर महिलाएं बंधन महसूस करती हैं। हां, पृथ्वीलोक की महिलाएं स्वतंत्रता की ओर बढ़ रही हैं। कुछ आधुनिकाएं तो स्वच्छन्दता की हद तक स्वतंत्रता का उपभोग कर रही हैं, किन्तु देवलोक की देवियां अपने पतिप्रेम के कारण धूमने-फिरने भी नहीं जा सकी। यह तो मानना पड़ेगा कि देवलोक में यह बंधन देवियों ने स्वयं स्वीकार किया है, मृत्युलोक की तरह देवताओं ने परंपराओं के बंधन बनाकर उन्हें नहीं जकड़ा है। हां, महिलाओं को जो स्वतंत्रता असुरलोक में प्राप्त है, वह देवलोक में तो संभव नहीं है, हो सकता है पृथ्वीलोक पर विलासी प्रवृत्ति के पुरुषों व व्यावसायिकता के कारण यहां की महिलाओं को प्राप्त हो जाय किन्तु उसमें भी उनकी सुरक्षा को लेकर मैं संदेह में रहता हूँ।
नारद के लम्बे-चौड़े वक्तव्य को सुनकर पार्वती बोलीं-'नारद! आपकी प्रवृत्ति कभी नहीं बदलेगी। आप तो मुझे मेरे प्राणप्रिय महादेव के खिलाफ भड़काने का प्रयत्न कर रहे हो। मुझे ऐसी किसी स्वतंत्रता की आकांक्षा नहीं है। मैं अपने प्रियतम के प्रेम के बंधन में बंधकर ही आनंद पाती हूँ। आप तो इतना बताइये, महादेव के समाधि पर होते हुए मेरे पास जो खाली समय होता है; उसमें क्या किया जाए?'
नारद दो मिनट मौन रहकर विचार करने लगे। अचानक उनके चेहरे पर प्रसन्नता के भाव उभरे मानो उन्हें पार्वती की समस्या का समाधान मिल गया हो। मुस्कराते हुए अपनी झोली में हाथ डाला और एक किताब निकाल कर पार्वती की ओर बढ़ाते हुए बोले-'महादेवी! समा चाहता हूं। देवाधिदेव के विरुद्ध आपको भड़काने का दुस्साहस मुझमें कैसे हो सकता है? मेरे लिए तो आप और महादेव दोनों ही पूज्य हैं। मैं तो केवल पृथ्वीलोक और असुरलोक के वातावरण की तुलना करके आपको बता रहा था। रही आपके अकेलेपन के -समय को काटने की बात, आपके चरणारविन्दों में यह पुस्तक समर्पित है। अभी-अभी मैं पृथ्वीलोक की यात्रा करके आ रहा हूं। यहां एक कहानीकार था, जिसे लोग उपन्यास सम्राट भी कहते हैं। मुझे भी उसके उपन्यासों के बारे में जानने की जिज्ञासा हुई तो एक बुक स्टॉल पर गया। बुक स्टॉल पर उपन्यास देखकर तो मेरी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गयी इतना बड़ा उपन्यास तो बेकार आदमी ही पढ़ सकता है। मेरे पास इतना समय कहां? जो उस उपन्यास को
पढ़ पाता। मुझे परेशान देखकर बुक-विक्रेता ने यह किताब मुझे दी और कहा-'सर जी आप उपन्यास तो पढ़ नहीं पायेंगे, आप यह किताब ले जाने जय भी समय मिले एक कहानी पढ़ लो। इस प्रकार आपकी राह भी कट जायेगी और उपन्यास सम्राट मुंशी प्रेमचंद की लेखनी से परिचय भी हो जायेगा।
मैं उसे धन्यवाद देकर जैसे ही चलने लगा, उसने मेरी झोली पकड़ लो और बोला-किताब क्या फोकट में मिलती है? इसकी कीमत चुकाओ तब किताब लेकर जाओ।' मेरे पास भारतीय मुद्रा तो थी नहीं, देवलोक की मुद्रा को उसने नकली बताकर लेने से इन्कार कर दिया। मजबूरन मुझे उसे अपना परिचय देने को मजबूर होना पड़ा। मेरे परिचय देने के बाद वह अट्टहास करके हंसने लगा और बोला-'ओ बाबा! मैं तेरी इन चिकनी-चुपड़ी बनावटी बातों को नहीं मानता किन्तु यह किताब काफी दिनों से पड़ी है; आजकल हिन्दी की बुक्स का कोई क्रेज भी नहीं रहा। अत: यह बुक मैं तुम्हें दया करके दे देता हूं।'
पार्वती बोली-'किन्तु नारद! तुम किसी से कोई वस्तु मुफ्त में स्वीकार नहीं करते। यहां तक कि आवभगत में नाश्ता-पानी के एवज में भी समाचार सुनाकर हिसाब चुकता कर देते हो, फिर आपने उससे यह किताब या बुक जो भी हो स्वीकार कैसे को?'
'महादेवी के वचन शत-प्रतिशत सत्य हैं। मैं उसे किताब वापस करने का वचन देकर किताब लाया हूं। अत: आपके पढ़ने के बाद मैं मृत्युलोक की अपनी अगली विजिट में यह किताब उस किताब वाले को धन्यवाद सहित वापस कर आऊंगा। अब आप मुझे प्रस्थान करने की आज्ञा प्रदान करें। महादेव के समाधि से उठने पर पुनः आऊंगा।' यह कहते हुए नारद उठकर खड़े हो गए।
नारद को विदा कर पार्वती पुन: महादेव के पास आई। उनके आसन की साफ-सफाई की और पुन: अपने आसन पर बैठकर किताब का अवलोकन करने लगी। अनुक्रमणिका में कहानियों के शीर्षक देख रही थी कि उनकी नजर 'पंच परमेश्वर' पर टिक गई उन्हें आश्चर्य हुआ कि महादेव का नाम इस किताब में कैसे आ गया। उन्हें परमेश्वर से पहले 'पंच' शब्द भी अजीब लग रहा था। खैर हो सकता है कि कहानीकार महादेव का भक्त हो और 
पंच-परमेश्वर कहानी के माध्यम से उन्होंने परमेश्वर श्री महादेव की महिमा का बखान किया हो। कुछ आश्वस्त होते हुए उन्होंने सर्वप्रथम उस कहानी को पदना प्रारंभ किया। पार्वती ने पूरी कहानी को पढ़ डाला। कहानी उत्सुकता के साथ पढी। वह काफी रोचक लगी किन्तु कहानी में महादेव का नाम न पाकर वे बेचैन हो उठी। उन्हें कहानीकार प्रेमचंद पर क्रोध आने लगा। वे विचार करने लगी, मृत्युलोक के सामान्य आदमी के लिए परमेश्वर शब्द का इस्तेमाल करके उसने परमेश्वर का अपमान किया है क्योंकि ब्रह्माण्ड में परमेश्वर तो केवल देवाधिदेव महादेव ही हैं। मृत्युलोक के एक सामान्य से कहानीकार की इतनी जुर्रत कि वह परमेश्वर शब्द का प्रयोग सामान्य मानयों के लिए करे। इसे दण्डित करना ही होगा। पार्वती विचारमग्न होते हुए आक्रोशित हो रही थी कि तभी उन्होंने अपने नेत्रों को बन्द पाया और महादेव के स्पर्श को महसूस किया।
पार्वती ने सामान्य होने का प्रयत्न करते हुए कहा-'स्वामी समाधि से उठ गये मेरे अहोभाग्य! मैं तो आपकी सेवा करने के लिए तरस गयी थी। आप बैठिए मैं आपके लिए जलपान की व्यवस्था करती हूं।' महादेव ने पार्वती को प्रेम से पकड़कर अपनी गोद में बिठा लिया-'पार्वती जी जलपान की ऐसी क्या जल्दी है? अभी तो हम आपके पास बैठकर आपके स्नेह का पान करना चाहते हैं। समाधि के समय आपने समय कैसे व्यतीत किया? आपके समाचार जानना चाहते हैं।' महादेव के प्रेम भरे वचनों से अभिभूत पार्वतीजी ने लजाकर अपना चेहरा महादेव के वक्ष में छिपा लिया। महादेव ने प्रेमपूर्वक अपना हाथ महादेवी के केशों पर फिराते हुए कहा-'क्या बात है आज महादेवी वैचारिक रूप से आक्रोशित लग रही हैं?' पार्वतीजी ने कहा-'कुछ विशेष बात नहीं है। आप कई दिनों बाद समाधि से उठे हैं आइये पहले आपको स्नान कराती हूं, तदोपरान्त जलपान के बाद वार्ता उचित रहेगी।'
'नहीं, जब तक आपके विचारों में आक्रोश होगा; आप स्नान कराकर हमें शीतलता प्रदान कैसे करेंगी? विचारों में शान्ति व मृदुता के स्थान पर आक्रोश होने पर जलपान स्वास्थ्यकर कैसे होगा? अतः उचित यही है कि महादेवी उद्विग्नता के कारण को बतलायें और शान्ति की अनुभूति करें। चिन्तन व अभिव्यक्ति वैचारिक उद्विग्नता व आक्रोश का शमन करने के आधारभूत उपकरण है।' महादेव ने पार्वती से स्नेहपूर्वक आग्रह किया।
'स्वामी तो अन्तर्यामी हैं फिर भी मेरे मुंह से ही क्यों कहलवाते है इसका राज आज समझ आया। स्वामी मुझे वैचारिक रूप से शान्ति और प्रसन्नता प्रदान करने के लिए ही मेरे मुंह से सब कुछ सुनते हैं।' 'यह तो एक पहलू है पार्वती! इसका दूसरा पहलू यह है प्रिये, आपकी वाणी को सुनकर हमें असीम आनन्दानुभूति होती है। अत: आप तो अपनी मधुर वाणी से अपने आक्रोश का कारण बताकर श्रवणामृत का पान करायें।' महादेव ने मुस्कराहट के साथ पार्वती से प्रेमपूर्वक आग्रह किया।
पार्वती ने नारद के आने व उनसे किताब प्राप्त कर मुंशी प्रेमचंद की कहानी 'पंच-परमेश्वर' पड़ने का उल्लेख करते हुए कहा-'स्वामी! मृत्युलोक का एक मामूली कहानीकार मामूली इंसानों की तुलना परमेश्वर से कैसे कर सकता है? अवश्य ही यह दण्ड का भागी है। मैं आपका अपमान किसी भी कीमत पर सहन नहीं कर सकती। आपकी अनुमति से मैं उसे दण्डित करना चाहती हूं। यही मेरी उद्विग्नता का कारण है।'
शांत देवी शांत। न तो कहानीकार मामूली आदमी होता है और न ही पंच-परमेश्वर शीर्षक देकर कहीं भी हमारा निरादर होता है। इसके विपरीत इससे तो हमारा मान ही बढ़ता है। नि:सन्देह न्याय प्रदान हमारे वरदान प्राप्त करने के कृत्य से भी महान कृत्य है। देव और देवियां; ऋषि और मुनि वरदान । या श्राप दे सकते हैं किन्तु न्याय प्रदान करना मानव समुदाय में पंच का ही कृत्य है। न्याय संसार में किसी भी पदार्थ से अधिक महत्वपूर्ण है। न्याय प्रदान कर पंचायतें निश्चित रूप से महत्वपूर्ण कार्य करती हैं। हां, कुछ व्यक्ति पंचायत के नाम पर झूठी प्रतिष्ठा को जोड़कर एक-दूसरे के प्रेम में बंधे युवक-युवतियों को मौत के फरमान देकर जघन्य पाप करते हैं तथा इसे । मृत्युलोक में 'ऑनर किलिंग' का नाम दिया जा रहा है; हां इस प्रकार के जघन्य पाप करने वाले व्यक्ति मानव के रूप में राक्षसों से भी निकृष्ट कोटि के हैं। इस प्रकार के जघन्य कृत्य के समर्थन में आने वाली पंचायतें व जन समुदाय भी माफी के लायक नहीं है। यह सब होते हुए भी न्याय प्रदान करने वाले पंचों का महत्त्व कम नहीं हो जाता। न्याय प्रदान करने वाला इंसान हमसे भी बड़ा है। उसे 'परमेश्वर' नाम देकर कहानीकार ने हमारा सम्मान हा बढ़ाया है। अतः देवी उद्विग्नता का त्याग करें और मत्युलोक के भ्रमण के दौरान स्वर्व न्यायिक प्रक्रिया को देखकर आश्वस्त हो लें। 
मृत्युलोक के नियमित भ्रमण के दौरान शिव और पार्वती समस्त जीवों के सुख-दुखों का अवलोकन करते हुए चले जा रहे थे। इसी दौरान पार्वती को स्मरण हो आया और वे बोलीं-'स्वामी! आपने एक बार मेरे द्वारा 'पंच परमेश्वर' शब्द पर आपत्ति करने पर मृत्युलोक की पंचायतों की प्रशंसा करते हुए मुझे पंचायतों की न्याय प्रणाली का अवलोकन कराने का वायदा किया था। कृपया अब मुझे पंचायतों के द्वारा न्याय प्रदान करने की शक्ति का अवलोकन करायें।' 'देवी ने सही फरमाया। निश्चित रूप से आपको पंचायत की न्यायिक प्रणाली का अवलोकन कराना चाहता हूं किन्तु सामने के जिस गांव की ओर आप संकेत कर रही हैं, वहां की पंचायत न्याय प्रदान करने में सक्षम नहीं रह गयी है। ऑनर किलिंग के नाम पर यहां निदोष युवक-युवतियों की हत्या की जाती है। यहां के लोगों का जमीर भी इतना मर चुका है कि वे इस प्रकार के जघन्य कृत्य के विरोध में खड़े नहीं होते। अत: इस प्रकार के कुकृत्य करने वाले गांव में हमारा प्रवेश किसी भी प्रकार से उचित नहीं। कोई भी देव इस गांव में। प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष रूप से नहीं आयेगा। इस प्रदेश की सीमा की समाप्ति पर अगली ग्राम पंचायत की सीमा में आपको न्यायिक प्रक्रिया देखने का अवसर प्राप्त हो सकता है।' महादेव ने पार्वती को जवाब दिया।
पार्वती और शंकर भ्रमण करते-करते काफी आगे निकल चुके थे। पार्वती ने फिर याद दिलाया-'स्वामी! मुझे पंचायत की कार्य प्रणाली दिखाकर पंच के बारे में मेरी जिज्ञासा को शान्त करने की कृपा करें।' महादेव ने कुछ क्षणों तक विचार किया और बोले-'देवी! इस समय पंचायत के सामने कोई विवाद ही नहीं है तो हम आपकी पंचायती न्याय प्रणाली का अवलोकन कैसे कराये? इसके लिए तो हमें तब तक यहीं ठहरना पड़ेगा, जब तक पंचायत के समक्ष न्याय-निर्णय के लिए कोई विवाद नहीं आ जाता। हम यहां लंबे समय तक कैसे रुक सकते हैं? अत: इस कार्य को अगले भ्रमण के लिए स्थगित करके हमारा कैलाश लौटना ही उचित होगा।'

पार्वती निराश होते हुए बोली- स्वामी इस प्रकार तो मैं कभी भी पंचों की कार्यप्रणाली का अवलोकन नहीं कर पाऊंगी। इसके लिए हम अपनी माया से विवाद पैदाकर पंचों के सामने प्रस्तुत करें तो उनकी न्याय प्रणाली का अवलोकन कर सकेंगे। आपसे मेरी प्रार्थना है कि मेरी जिज्ञासा का समाधान अवश्य करें।' 'यह तो पंचायत की परीक्षा लेना हो जायेगा, जो मुझे उचित नहीं

लगता। देवी पुनः विचार कर लें पंचों की न्याय शक्ति पर संदेश की परीक्षा लेना अनुचित है। देवी ने इसी प्रकार का सन्देह श्रीराम के लेकर किया था और परीक्षा ली थी तो काफी लंबे समय तक हम दोनों अलग-अलग रहना पड़ा था। अतः इस विचार का त्याग करना ही उचित का पड़ता है।' महादेव ने मत प्रकट किया।

पार्वती ने आग्रहपूर्वक प्रार्थना की-निःसन्देह मुझसे उस समय भूल हुई थी और उस भूल के लिए मैं दण्ड भी भोग चुकी हूं। अब मैं किसी प्रकार को गलती नहीं करूंगी। स्वामी जिस प्रकार चाहेंगे, उसी प्रकार विवाद का सूजन करें किन्तु स्वामी मुझे पंचों की महानता के दर्शन अवश्य करायें। मैं पंचों की न्यायिक शक्ति पर सन्देह नहीं कर रही; मैं तो उसका अवलोकन कर अपनी जिज्ञासा शान्त करना चाहती हूं।' 'ठीक है! किन्तु ध्यान रहे, पंचों की न्यायिक प्रक्रिया में हम अपनी मायावी या दैवी शक्ति का प्रयोग करके किसी प्रकार का हस्तक्षेप नहीं करेंगे। यह बात आप याद रखें।' महादेव ने निर्देश दिया।

जैसी स्वामी की आज्ञा-'मैं कुछ नहीं करूंगी, केवल अवलोकन करूंगी। आप जैसा चाहें वैसा विवाद बनाकर प्रस्तुत करें।' लोगों की नजरों से बचने के लिए पार्वती ने भिखारिन का रूप बनाया और वहीं आस-पास विचरने लगी।
मध्याह्न का समय था। एक किसान काम की थकान उतारने के लिए एक
पेड़ के नीचे लेटा हुआ था। महादेव उसी किसान का रूप बनाकर ठीक उसी प्रकार उसकी बगल में लेट गये। कुछ समय बाद ही किसान की पत्नी भोजन लेकर वहां पहुंच गई और दूर से ही बोली-'अजी! उठ जाओ और हाथ मुंह धोकर रोटी खा लो।' किसान पत्नी की आवाज सुनकर आंखें मिचमिचाता हुआ जगा तो साथ ही उसका हमशक्ल दूसरा किसान भी ठीक उसी प्रकार उठा। किसान व किसान की पत्नी दोनों ही आश्चर्य में पड़ गये। किसान की पत्नी निर्धारित नहीं कर पा रही थी कि दोनों में कौन-सा उसका पति है? इधर दोनों किसान आपस में झगड़ने लगे और एक-दूसरे पर बहुरूपिया होने का आरोप लगाने लगे। दोनों एक ही महिला पर अपनी पत्नी होने का दावा कर रहे थे। आस-पास के खेतों से और किसान भी आ गये। किसी की समझ में नहीं आ रहा था कि मामला क्या है। सभी ने मिलकर कहा-'चलो पंचायत में मामला रखते हैं, अब तो पंच ही यह निर्धारित कर सकते हैं कि वास्तविक 
किसान कौन है और यह स्त्री किसकी पत्नी है?'
दोनों किसानों को पंचायत घर ले जाया गया। पंचायत घर में पंचायत का आयोजन हुआ। पंचों को भी समझ नहीं आ रहा था कि क्या किया जाए। दोनों में कोई समानता नहीं वरन् दोनों एक ही थे। खैर पंचों को कोई न कोई रास्ता तो निकालना ही था। अतः उन्होंने पंचायत घर के अंदर जाकर आपस में विचार विमर्श किया। बाहर आकर पुनः जब वे अपने-अपने आसनों पर बैठे तो सभी उत्सुकता से उनकी ओर देखने लगे।
एक पंच ने खड़े होकर कहा-'हम सभी ने मिलकर यह तय किया है कि वास्तविक किसान कौन है? इसका निर्धारण करने के लिए हम दोनों को कुछ काम देंगे और जो उन सभी कामों को पहले पूर्ण कर लेगा, यह स्त्री उसी । की पत्नी होगी।' सर्वप्रथम दोनों में अंतर करने के लिए एक को सरसों व दूसरे को गेंदे के फूलों की माला पहनाई गई। पंच ने पुन: जनता को संबोधित करते हुए कहा-स्त्री के लिए वस्त्र और आभूषण विशेष प्रिय होते हैं। इस स्त्री के पास न तो ढंग के वस्त्र हैं और न ही आभूषण। अत: दोनों किसानों को निर्देशित किया जाता है कि अपनी पत्नी के लिए सुन्दर वस्त्र व आभूषणों की व्यवस्था करें।' बेचारा गरीब किसान कहां से अच्छे वस्त्र और आभूषणों को व्यवस्था करता? अतः सरसों के फूलों की माला पहने हुए किसान निराश होकर वहीं जमीन को कुरेदने लगा, जबकि गेंदा के फूलों की माला पहने हुए किसान तुरंत गया और पांच मिनट बाद ही सन्दर-सन्दर वस्त्र और आभूषण
ले आया। वस्त्रों और आभूषणों को देखकर न केवल वह महिला वरन् सभी भौचक्के रह गये। पंचों के चेहरों पर हल्की-सी मुस्कान आ गई। वे पहली बार दोनों में कोई अन्तर देख रहे थे।
दूसरे पंच ने खड़े होकर कहा-'किसान का मूल आधार बैल होते हैं, यह किसान इतना लापरवाह रहा है कि इसने अपने बच्चों के लिए एक गाय और अपने खेतों के लिये बैलों की भी व्यवस्था नहीं की। अतः अब इसको चाहिए कि आज पड़ोस की हाट में जाकर बैलों की जोड़ी व एक गाय लेकर आये
ताकि इसकी स्त्री प्रसन्न रह सके।' दोनों किसान गये, गेंदा के फूलों की माला पहने हुए किसान दस मिनट बाद ही बैलों की सुन्दर जोड़ी व एक सुन्दर गाय के साथ पंचों के सम्मुख प्रस्तुत हुआ। सरसों के फूलों की माला पहने हुए किसान अपना चेहरा लटकाए वापस आ गया। उसके पास बेल व गाय
सहायता भी नहीं की।
खरीदने को धन ही नहीं था और किसी ने उसकी सहायता भी
भिखारिन बनी पार्वती दूर से ही तमाशा देख रही थी। अब तीसो ने खडे होकर कहा-'बड़ा जाटल मामला है, न्याय करने की एवज में पंख के लिए भी कुछ काम करने होंगे तभी उसकी पत्नी उसे दी जायेगी। किसानों ने एक साथ कहा-'पंचायत के लिए काम करके हमें प्रसन्नता होगी। हमें बताया जाय क्या काम करना है?' यद्यपि दोनों किसानों ने यह वाक्य बोला था किन्तु सरसों के फूलों की माला पहने हुए किसान की आवाज निराशके
कारण कमजोर थी।
सरपंच ने दोनों किसानों को आश्वस्त किया-वे घबड़ाये नहीं, यह सयों उसी के साथ भेजी जायेगी जो उसका वास्तविक पति होगा। यह एक न्यायिक प्रक्रिया है। अत: किसी भी प्रकार का निष्कर्ष निकालकर निराश न हो। हां न्यायिक प्रक्रिया में दोनों को भाग लेना होगा, ताकि वह निर्धारित किया जा सके कि यह महिला वास्तव में किसकी पत्नी है?' सरपंच ने तीसरे पंच को अपनी बात कहने का संकेत किया।
दोनों किसानों की ओर मुखातिब होकर तीसरे पंच ने कहा-'तीसरी परीक्षा यह है कि ग्राम पंचायत की 30 एकड़ जमीन अनुपजाऊ और बंजर पड़ी है। अब देखना यह है कि दोनों किसानों में से कौन-सा किसान उसको उपजाऊ और हरी-भरी बना देता है?' सरसों के फूलों की माला पहने हुए किसान एक बार फिर निराश होकर जमीन पर बैठ गया जबकि दूसरा किसान तुरंत उस भूमि पर गया और कुछ समय बाद आकर पंचों से बोला-'जमीन उपजाऊ और हरी-भरी बन चुकी है। पंच निरीक्षण कर सकते हैं।'
अब चौथे पंच की बारी थी-'चौथा पंच खड़ा हुआ और बोला-'गांव में स्कूल भवन नहीं है, मास्टरजी बच्चों के पेड़ के नीचे पढ़ाते हैं। अत: पंचायत इन दोनों किसानों को निर्देश देती है कि वे एक-एक करके स्कूल भवन का। निर्माण करें, हम देखेंगे कौन सुन्दर व मजबूत भवन का निर्माण करता है?' गेंदा के फूलों की माला की फिर विजय हुई उस किसान ने शीघ्र ही पंचों को एक सुन्दर, मजबूत व सुविधाजनक स्कूल भवन ही नहीं उसके साथ मास्टरजी । के आवास की भी व्यवस्था की थी। सभी पंच प्रसन्न हो गये।
अब सरपंचजी की बारी थी। सरपंचजी ने सरसों के फूलों की माला पहने किसान की ओर इंगित करते हुए कहा-'तुम कुम्हार के पास जाकर एक
रे छेद से बाहर आने के बाद कर दिया
हांडी व उसका ढक्कन लेकर आओ।' उस किसान को पहली बार लगा कि यह कार्य उसकी क्षमता के अनुसार है और कुछ ही देर में वह हांडी लेकर उपस्थित हो गया। इसके बाद वह हांडी दूसरे किसान को दी कि तुम इसमें नोटे-छोटे 99 छेद कर दो। वह किसान तो सब कुछ कर सकता था। वह पंचायत भवन के पीछे गया और उसमें बड़े सुंदर व सुडौल छेद करके ले आया। सरपंच ने पुन: पहले किसान को भेजकर गांव के तालाब से चिकनी मिट्टी मंगवाई। हांडी पर उसका ढक्कन सही प्रकार से रखकर चिकनी मिट्टी से उसके मुंह को भली प्रकार बंद कर दिया गया।

अब सरपंच ने दोनों के हाथ में गंगाजल देकर शपथ दिलाई-'वे किसी भी प्रकार इस हांडी को फोड़ेंगे नहीं, कोई चालाकी नहीं करेंगे।' जब वे दोनों शपथ ले चुके, सरपंच ने उस हांडी के एक छेद से प्रवेश कर दूसरे से निकलकर आने का निर्देश दिया। सरसों के फूलों की माला पहने किसान ने निराशा से जमीन पकड़ ली जबकि दूसरे किसान ने सूक्ष्म रूप बनाकर हांडी में प्रवेश किया। सरपंचजी ने उस छेद को चिकनी मिट्टी से बन्द कर दिया
और दूसरे छेद से निकलकर आने को कहा। बाहर आने के बाद दूसरे छेद को भी बंद कर दिया गया। पुनः तीसरे छेद से प्रवेश करने को कहा गया और उसे बंद कर दिया गया। यह प्रक्रिया जारी रही और हांडी के 98 छेद बंद हो चुके थे। अब एक ही छेद रह गया तो फिर उसमें प्रवेश करने के लिए कहा गया, जैसे ही गेंदा के फूलों की माला पहने किसान ने उसमें प्रवेश किया उस छेद को भी बंद कर दिया गया। अब बाहर एक ही किसान रह गया। सरपंच ने निर्णय सुनाया-'यही वास्तविक किसान है, यह स्त्री इसी की पत्नी है। यह स्त्री इन वस्त्रों व आभूषणों को लेकर गाय और बैलों की जोड़ी के साथ अपने पति को लेकर अपने घर जा सकती है।
वह स्त्री बोली-'पंचों की जय हो, पंचों की कृपा से मेरा पति मुझे मिल गया किन्तु ये वस्त्राभूषण, गाय और बैल मेरे नहीं हैं तथा अत्यन्त आवश्यक होते हुए भी हम दोनों इन्हें स्वीकार नहीं कर सकते। हम दोनों परिश्रमपूर्वक दो रोटी खाने में विश्वास करते हैं। हम गरीब ही सही किन्तु मुफ्त में कुछ पाना नहीं चाहते। अत: यह सभी सामग्री हमारी तरफ से पंचायत ग्रहण करे।'
सरपंच ने कहा-'ठीक है। जैसी तुम्हारी इच्छा। फावड़ा लाकर एक गड्ढा खोदकर उसमें यह हांडी दबा दी जाय।' भिखारिन बनी पार्वतीज
घटनाक्रम को देखकर आश्चर्यचकित रह गई और तुरन्त पंचायत के समक्ष जोडकर उपस्थित हुई और पंचों से निवेदन किया-नि:सन्देश आपने नही न्याय किया है। पंच परमेश्वर होते है किन्तु इस हांडी में मेरे पतिदेव बंट कृपया, उन्हें छोड़कर मुझ पर अनुग्रह करें। अब सभी का ध्यान उस भिखारिन की ओर हो गया। सरपंच ने कहा-'हम समझ रहे हैं, आप लोग साधारण व्यक्ति नहीं है। आपको अपने पति को मुक्त करवाना है तो अपना वास्तविक परिचय दीजिए और हमारे सामने अपना वास्तविक रूप प्रकट कीजिए।'
अब पार्वती के सामने कोई चारा नहीं था। उन्होंने न केवल अपना परिचय दिया वरन् वास्तविक रूप में आकर सभी को दर्शन दिये। सभी पंचों व ग्रामीणों के आश्चर्य का ठिकाना न रहा। तुरंत हांडी का बक्कर हटा कर, महादेव को बाहर निकाला गया। सभी ने शंकर-पार्वती के युगल रूप के दर्शन कर अपने जीवन को कृतार्थ किया।

नन्हीं चिड़िया, Hindi Short Stories


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